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Fundamental Rights In Hindi – मौलिक अधिकार “मौलिक अधिकार” क्या हैं आज हम “Fundamental Rights In Hindi – मौलिक अधिकार”  के बारे में बात करने वाले हैं इस से पहले अगर आपने निचे दिए गए कुछ टॉपिक्स को नहीं पढ़ा तो पढ़ लीजिए क्योकि यह भी आपकी परीक्षा में आपके लिए बेहद उपयोगी हैं |

Fundamental Rights In Hindi – मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकारों को ‘ भारत का मैग्नाकार्टा’ की संज्ञा दी गयी है। यह मूल इसलिए है क्योंकि यह व्यक्ति के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक है।

★ यह नागरिकों के वैधानिक अधिकार हैं जो राज्य के शोषण से उन्हे सुरक्षा प्रदान करते है। यह अधिकांश नकारात्मक श्रेणी के अधिकार है क्योंकि यह राज्य को क्या नहीं करना है, का दिशा निर्देश देते हैं।

★ मौलिक अधिकारों को सभी नागरिकों के बुनियादी मानव अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है। यह अधिकार जन्म स्थान, जाति, पंथ या लिंग के भेद के बिना सभी पर लागू होते है। यह अधिकार विशिष्ट प्रतिबंधों के अधीन उच्च न्यायालय और उच्चतम् न्यायालय द्वारा लागू होते है।

★ साधारण कानूनी अधिकारों को सुरक्षा देने और लागू करने के लिए साधारण कानूनों का सहारा लिया जाता है, वहीं मौलिक अधिकारों की गारंटी और उनकी सुरक्षा स्वयं संविधान करता है।

सामान्य अधिकारों को संसद कानून बना कर परिवर्तित कर सकती है परन्तु मौलिक अधिकारों में परिर्वतन के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता

★ सरकार का कोई भी अंग मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकता।

राष्ट्रपति को मौलिक अधिकारों को निलम्बित करने का अधिकार है (अनु. 358 और अनु.359 के अन्तर्गत)। हालांकि अनु.20 और अनु 21 के अधिकार किसी भी परिस्थिति में निलम्बित नहीं होते है। अनु 19 के अधीन अधिकार केवल युद्ध या बाहय आक्रमण के आधार पर घोषित आपातकाल के दौरान निलम्बित होगे परन्तु सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित आपातकाल में यह समाप्त नहीं होंगे।

★ मौलिक अधिकार असीमित नहीं है। राज्य इन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है।

मौलिक अधिकारों को छ: वर्गों में वर्गीकृत किया गया है:

1. समता सम्बन्धी अधिकार (अनु.14-18)
2. स्वतंत्रता संबंधी अधिकार (अनु. 19-22)
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु-23-24)
4. धार्मिक स्वतंत्रता (अनु.25-28)
5. सांस्कृतिक एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनु. 29-30)
6. संवैधानिक उपचार का अधिकार (अनु.32)

★ प्रारम्भ में मौलिक अधिकारों के 7 वर्ग थे। परन्तु संपत्ति के अधिकार के समाप्त ( 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा होने के बाद यह 6 वर्ग में विभाजित रह गये है।

★ निम्न अनुच्छेदों के अंतर्गत विदेशियों को भी मौलिक अधिकार की सुरक्षा -14,20,21,22,23,24,25,26,27,28

अनु 12 राज्य की परिभाषा- इसके अधीन केंद्र सरकार और संसद, राज्य सरकार और राज्य विधानमंडल, स्थानीय निकाय जैसे पंचायत और नगरपालिका और वैधानिक प्राधिकरण जैसे भेल, एलआईसी आदि आते है।

अनु. 13-

यदि कोई कानून/नियम, परंपरा, आदेश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो वह कानून/नियम मान्य नहीं होगा।

अनु. 14-

विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसके साथ ही भारत की सीमाओं के अंदर सभी व्यक्तियों (विदेशी भी) को कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है। (केवल शत्रु देश के नागरिक को छोड़कर)।

विधि के समक्ष समता” के सिद्धांत ब्रिटिश मूल का है। इसका प्रतिपादन ए वी डाइसी ने किया है। यह विचार विधि के शासन के सिद्धांत का आधारभूत तत्व है।

विधियों के समान संरक्षण का सिद्धांत अमेरिका से ग्रहण किया गया है।

अपवाद अनु 361 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल के विरूद्ध पद पर रहते हुए फौजदारी का मुकदमा दर्ज नहीं होगा दीवानी मुकदमा दो माह की सूचना के बाद ही चलाया जा सकता है, पद पर रहते हुए इनकी गिरफ्तारी या कारावास की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की जा सकती।

संसद में या राज्य के विधानमण्डल या उसकी किसो समिति में सांसद (अनु. 105) या विधायक (अनु. 194) द्वारा कही गई किसी बात या किसी मत के संबंध में उसके विरूद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी। विदेशी राजदूत एवं कूटनीतिक व्यक्ति दीवानी और फौजदारी मुकदमों से मुक्त होंगे।

अनु. 15-

केवल लिंग, धर्म, जाति, प्रजाति या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है।

अंशत: या पूर्णतः राज्य के कोष से संचालित सार्वजनिक स्थल जैसे मनोरंजन केंद्र या सार्वजनिक दुकानें, होटल, जनता के प्रयोग के लिए प्रयुक्त होने वाले कुएं, तालाब, स्नान घाट आदि में निःशुल्क प्रवेश के संबंध में सभी को अधिकार होंगे । यह अधिकार न केवल राज्य वरन् निजी व्यक्तियों के द्वारा विभेद को भी निषेध करता है।

हालांकि राज्य को अधिकार है कि वह सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों के उत्थान के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए नियम बना सकता है।

अनु. 15 (4)

शिक्षण संस्थाओं में, जिसमें गैर सरकारी व गैर अनुदान प्राप्त भी सम्मिलित है, अन्य पिछड़ों अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई है। (93 वें संविधान संशोधन 2005 द्वारा)

नागरिक अधिकार आन्दोलन (1955-68) अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिकों ने समान अधिकार की मांग और नस्लीय भेदभाव की समाप्ति के लिए आन्दोलन किया। इसका नेतृत्व मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने किया था।

अनु. 16

सार्वजनिक सेवाओं में सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान करता है। परन्तु राज्य पिछड़े वर्ग के लिए नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है जिनका राज्य में समान प्रतिनिधित्व नहीं है।

अनु. 16 (4)

पिछड़े वर्ग के नागरिकों को सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए उनके लाभार्थ सकारात्मक कार्यवाही के उपायों के क्रियान्वयन हेतु अपवाद बनाए जाते हैं। इस आधार पर अन्य पिछड़े वर्ग को सामाजिक एवं शैक्षिक आधार पर सार्वजनिक / सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

14 जनवरी 2019 से 103 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़ों को 10 फीसद आरक्षण देने का प्रावधान लागू हो गया

है। संविधान के अनु- 15 और अनु. 16 में संशोधन किया गया जिसके द्वारा राज्यों को आर्थिक रूप से सर्वण पिछड़ों के लिए आरक्षण का अधिकार दिया गया।

आरक्षण के लिए अर्हता

● ऐसे परिवार जिनको सालाना आय आठ लाख या उससे कम होगी।

● जिनके पास पांच एकड़ या इससे कम कृषि योग्य भूमि है।

● ऐसे परिवार जिनके पास एक हजार वर्ग फीट या उससे कम का मकान है।

अधिसूचित नगरीय क्षेत्र में जिनके पास 100 गज का प्लॉट है।

● जो अभी तक किसी भी तरह के आरक्षण के अंतर्गत नहीं आते हैं।

अनु. 17 अस्पृश्यता का निषेध-

यह अधिकार निजी व्यक्ति और राज्य को दायित्व देता है कि वह इस अधिकार के हनन को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं (अस्पृश्यता अपराध अधिनियम, 1955)।

इसके अंतर्गत अपराध माना जाएगा यदि –

किसी व्यक्ति को पूर्जा स्थल दुकान, सार्वजनिक मनोरंजन स्थल, हॉस्पिटल, हॉस्टल, शिक्षण संस्थान आदि में प्रवेश की रोकना।

अनु.18

उपाधियों की समाप्ति अनुच्छेद के आधार पर उपाधियों को प्रतिबंधित किया गया है। भारत रत्न, पद्म विभूषण आदि पुरस्कारों को उपाधियों की श्रेणी से बाहर रखा गया हैं |

ज्ञात रहे- उपरोक्त पुरस्कारों का प्रारम्भ 1954 में किया गया। वर्ष 1977 से 1980 तक निलम्बित होने के बाद दोबारा इन पुरस्कारों का वितरण प्रारम्भ हो गया।

अनु. 19-

स्वतंत्रता का अधिकार इसके अन्तर्गत 1976 तक सात उपबन्ध आते थे, परन्तु 1978 में 44 वें संविधान संशोधन से सम्पत्ति के अधिकार [19 (1) f] को समाप्त कर दिया गया। अब संपत्ति का अधिकार केवल वैद्यानिक / कानूनी अधिकार (अनु. 300 क) है।

19 (1) (a)- भाषण एवं अभिव्यक्ति के अधिकार अनुच्छेद के अर्न्तगत सूचना का अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता का अधिकार निहित है। प्रदर्शन एवं विरोध का अधिकार है, परन्तु हड़ताल का अधिकार नहीं है।

राज्य वा एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध कुछ आधार पर लगा सकता है राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मित्रवत् संबंध, नैतिकता, देश की एकता एवं संप्रभुता आदि ।

19 (1b)- शांतिपूर्वक व निरायुध सभा करने का अधिकार।

19 (1c) संगम या संघ बनाने का अधिकार।

19 (1d)- भारत के समूचे क्षेत्र में आबाध संचारण (भ्रमण) की स्वतंत्रता

19 (10)- भारत के किसी भी क्षेत्र में निवास करने व बसने की स्वतंत्रता।

19 (1g) किसी भी प्रकार की वृत्ति व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता।

अनु.20

अपराधों के लिए दोष सिद्धि के संदर्भ में संरक्षण किसी भी अपराध के लिए दो बार सजा से बचाव, पूर्व पद प्रभाव नहीं (पूर्व के अपराध के लिए नये कानून के तहत सजा नहीं), विधि के द्वारा स्थापित प्रक्रिया के आधार पर ही सजा देने का प्रावधान अपने विरूद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

नोट: संविधान संशोधन 44 वाँ 1978 द्वारा प्रावधान किया गया है कि यह अनुच्छेद आपातकाल में समाप्त नहीं होगा ।

अनु. 21-

प्राण एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार है, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इस अनुच्छेद को संविधान की रीढ़ कहा है। शिक्षा का मूल अधिकार (6 से 14 वर्ष के बालकों के लिए) अनु. 21 (क) में सम्मिलित किया गया है। अन्य अधिकार है

निजता का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, सूचना का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण प्रदूषण रहित जल एवं वायु में जीने का अधिकार, विदेश यात्रा करने का अधिकार, महिलाओं के साथ आदर और सम्मानपूर्वक व्यवहार करने का अधिकार।

अवश्य पढ़े-

शिक्षा का अधिकार राज्य के नीति निदेशक अनु.45 में और मौलिक कर्त्तव्य अनु 51 क में इसका उल्लेख है। 86 वें संविधान संशोधन 2002 के द्वारा नवीन अनु 21 (क) जोड़ा गया। अनुच्छेद 21 (क) के अनुसरण में संसद में 6 से 14 वर्ष की आयु तक बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 में पारित किया गया। यह कानून 01 अप्रैल 2010 में लागू हो गया।

नोटः 44 वें संविधान संशोधन (वर्ष 1978) द्वारा प्रावधान किया गया है कि अनुच्छेद 21 आपातकाल में भी समाप्त नहीं होगा।

अनु. 22-

गिरफ्तारी एवं निरोध से सरंक्षण हिरासत दो तरह से होती है-एक व्यक्ति को ठंड मिलता है जिसे अदालत में दोषी ठहराया जा चुका है। निवारक हिरासत वह है जिसमें बिना अदालत में सुनवाई के हिरासत में रखा जाता है। गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार निम्न है

जज के सम्मुख 24 घण्टे में पेश होने का अधिकार (सीआरपीसी की धारा 57 के तहत )

डी. के. बासु दिशानिर्देश पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी, हिरासत और पूछताछ के दौरान पालन करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित विशिष्ट आवश्यकताएं और प्रक्रियाएं है।

निवारक नजरबंदी (Prevention Detention) सामान्यतः किसी व्यक्ति को अपराध करने पर गिरफ्तार किया जाता है। पर कभी-कभी किसी व्यक्ति को इस आशंका पर भी गिरफ्तार किया जा सकता है कि वह कोई गैर-कानूनी कार्य करने वाला है और फिर उसे वर्णित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही तीन माह के लिए जेल भेजा जा सकता है। इसे ही निवारक नजरबंदी कहते हैं। जैसे टाडा, पोटा, मकोका।

अनु. 23-

बेगार (बलात श्रम ) व मानव के क्रय विक्रय का प्रतिबंध अनु. 24 बालश्रम का निषेध- 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए किसी फैक्टरी, खान अथवा अन्य किसी अन्य गतिविधि जिसमें बच्चों को नुकसान पहुंचने की संभावाना हो, उसमें नियोजन (रोजगार) का प्रतिषेध करता है।

अनु. 25-

धार्मिक स्वतंत्रता व अंतकरण की स्वतंत्रता इसके अन्तर्गत मानने का अधिकार, आचरण का अधिकार प्रसार का अधिकार है। परन्तु धर्म परिवर्तन का अधिकार संविधान ने प्रदान नहीं किया है। हव्यक्तिगत् अधिकारों की गारंटी देता है।

अनु. 26-

धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता। यह धार्मिक संप्रदाय या इसकी शाखाओं को अधिकार प्रदान करता है।

अनु. 27-

धर्म की अभिवृद्धि विकास के लिए कर अदायगी से स्वतंत्रता।

अनु. 28-

कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में शामिल होने के विषय में स्वतंत्रता | चार प्रकार के शैक्षिक संस्थानों का वर्गीकरण हैं |

संस्था

1. जिनका पूरा रख रखाव राज्य करता है

2. जिनका प्रशासन राज्य करता है लेकिन उनकी

स्थापना किसी न्यास (Trust) द्वारा हो

3. राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान

4. राज्य द्वारा वित्त सहायता प्राप्त कर रहे हों

धार्मिक निर्देश

पूरी तरह प्रतिबंधित

अनुमति है

स्वैच्छिक आधार पर

धार्मिक शिक्षा की अनुमति

स्वैच्छिक आधार पर धार्मिक शिक्षा की अनुमति

अनु. 29-

अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का सरंक्षण। यह अनुच्छेद धामिक और

भाषाई अल्पसंख्यको को सुरक्षा प्रदान करता है। अनु.30-अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार।

अनु. 31-सम्पत्ति का अधिकार

44 वें संविधान संशोधन, 1978 से अनु. 31 में प्रदत्त अधीकार को समाप्त किया गया। इसी संविधान संशोधन से अनु.19 (1) (एफ) को भी समाप्त किया गया था।

अनु 19 (1) (एफ) में सम्पत्ति को अधिग्रहण धारण और विक्रय / बेचने का अधिकार था, जबकि अनु. 31 के अनुसार कोई भी व्यक्ति कानून के द्वारा अपनी संपत्ति बचाने से वंचित नहीं किया जाएगा।

अनु. 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इसे संविधान की आत्मा और हृदय ” कहा है। अनु. 32 के अंतर्गत केवल मूल अधिकारों की ही गारंटी दी गई है, अन्य अधिकारों की नहीं। मौलिक अधिकारों के हनन होने पर उच्चतम न्यायालय को लेख जारी करने का अधिकार है। पाँच लेख जारी किये जाते हैं।

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय उपरोक्त अनुच्छेदों के तहत ‘जनहित याचिका पर सुनवाई करती है। मौलिक अधिकारों के विपरीत यदि किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह सामान्य आदलत में जा सकता है।

बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) – यह व्यक्तिगत् स्वतंत्रता से संबंधित है। इसके द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता है। यदि गिरफ्तारी का तरीका या कारण गैरकानूनी या असंतोषजनक हो, तो न्यायालय गिरफ्तार व्यक्ति को छोड़ने का आदेश दे सकता है।

परमादेश (Mandamus)- यह आदेश तब जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे है।

निषेध (Prohibition) यदि निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके किसी मुकदमे की सुनवाई करती है तो ऊपरी अदालतें (उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय) उसे ऐसा करने से रोकने के लिए ‘निषेध / स्थगन आदेश जारी करती है।

उत्प्रेषण (Certiorari) – यदि निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई निर्णय या आदेश करता है, तो उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपरी अदालत या अधिकारी को हस्तांतरित कर दिया जाता है।

अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)- यदि न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी हक नहीं है तब न्यायालय ‘अधिकार पृच्छा आदेश’ के द्वारा उसे पद पर कार्य करने से रोक देता है। अन्य चार लेख से हटकर इसे किसी भी इच्छुक व्यक्ति द्वारा जारी किया जा सकता है न कि पीड़ित व्यक्ति द्वारा। कार्यालय आवश्यक रूप से सरकारी होना चाहिए और इसे विधि द्वारा अथवा स्वयं संविधान द्वारा सृजित होना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय (अनु.32) उच्च न्यायालय (अनु. 226)
केवल मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन के लिए जारी करता है।

किसी व्यक्ति या सरकार के विरूद्ध पूरे देश में किसी भी क्षेत्र में जारी कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय लेख जारी करने से मना नहीं कर सकता है। इसलिए इसे मौलिक अधिकार का रक्षक माना जाता है।

ना केवल मौलिक अधिकारों के मामले में वरन् अन्य मामलों के लिए

भी लेख जारी कर सकता है

केवल संबंधित अधिकार क्षेत्र में

लेख जारी कर सकता है।

उच्च न्यायालय का स्वैच्छिक अधिकार है और वह लेख जारी करने से इंकार कर सकता है।

अनु. 33-

विधि निर्माण का अधिकार केवल संसद को है न कि राज्य विधानमंडल को।  संसद कानून बना कर निम्न सेवाओं का समुचित निर्वहन सुनिश्चित करने तथा अनुशासन के रखरखाव के लिए के मौलिक अधिकारों के अनुप्रयोग को प्रतिबंधित कर सकती है। जैसे संघ गठित करने के अधिकार से सैन्य बलों को वंचित रखा गया है

1. भारतीय सशस्त्र सेनाओं (थल सेना, नौसेना और वायुसेना),

2. पुलिस बल के सदस्यों और खुफिया संगठन या ब्यूरो के सदस्य,

3. उन बलों के सदस्य जिन्हें लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सूचना प्रणालियों की व्यवस्था के संबंध में नियोजित किया गया है।

अनु. 34-

जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त (Martial Law) है, तब इस भाग के द्वारा प्रदत्त अधिकारों का निलम्बन सेना विधि प्रवृत्त रहने के दौरान संसद को निम्न विधि निर्माण का अधिकार है

1. किसी व्यक्ति की किसी ऐसे कार्य के संबंध में क्षतीपूर्ती करना, जिसने किसी ऐसे क्षेत्र में जहाँ सेना विधि प्रवृत्त थी, व्यवस्था को बनाए रखने के संबंध में कोई कार्य किया है।

2. संसद विधि द्वारा किसी ऐसे दंडादेश को विधिमान्य कर सकती है, जो उस समय पारित किया गया था जब उस क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त थी।

३. संसद की विधि ऐसे जब्ती (समपहरण) को विधिमान्य कर सकती है, जो सेना विधि प्रवृत्त क्षेत्र में की गयी थी।

अनु. 35-

इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान बनाने का अधिकार केवल संसद को है, राज्य विधानमंडल को नहीं। यह उपबंध है- अनु. 16 को खण्ड (3), अनु. 32 का खण्ड़ (3), अनु. 33

20 फरवरी 2000 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वेंकटचलैया की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय संविधान समीक्षा आयोग का गठन किया गया। दो वर्ष के विस्तृत विचार विमर्श के बाद 31 मार्च 2002 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। इस आयोग की सिफारिश के आधार पर मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून बनाए। लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के लिए आयोग ने नया अनुच्छेद 47 क जोड़ने की जो सिफारिश की थी उस पर संसद में कोई चर्चा नहीं हुई। आयोग ने सिफारिश की थी कि चीन के जनसंख्या नियंत्रण कानून में आवश्यक संशोधन कर उसे और प्रभावी होना चाहिए।

By Harshit

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